लखनऊ की अधूरी मोहब्बत |

लखनऊ की शामों में एक अजीब सी नरमी होती है। जैसे हवा भी धीरे-धीरे बातें करती हो, जैसे हर सड़क किसी कहानी को अपने भीतर छुपाए बैठी हो। इसी शहर में आरव रहता था। उम्र लगभग अट्ठाईस साल, पेशे से आर्किटेक्ट और दिल से थोड़ा पुराना इंसान। उसे तेज़ ज़िंदगी पसंद नहीं थी। उसे पसंद थी शाम की चाय, पुराने गाने और गोमती किनारे बैठकर लोगों को गुजरते हुए देखना।


एक दिन उसकी ज़िंदगी में मीरा आई।


मीरा से उसकी मुलाकात किसी फिल्मी अंदाज़ में नहीं हुई थी। न बारिश थी, न कोई टकराहट। बस एक किताबों की दुकान में दोनों एक ही किताब उठाने गए और दोनों के हाथ एक साथ उस किताब पर आ गए। दोनों हल्का सा मुस्कुरा दिए। उस दिन बस दो मिनट की बात हुई, लेकिन जाने क्यों आरव को लगा कि इस लड़की की आवाज़ वह पहले भी कहीं सुन चुका है।


कुछ दिन बाद वही लड़की उसे फिर मिली। इस बार एक कैफे में। फिर धीरे-धीरे मुलाकातें बढ़ीं। कभी कॉफी, कभी शाम की सैर, कभी बिना वजह लंबी बातें। मीरा बहुत अलग थी। वह हर चीज़ को महसूस करती थी। बारिश देखती तो रुक जाती, पुराने घर देखती तो कहानियाँ बना लेती, और चाँद देखकर कहती— “कुछ चीज़ें सिर्फ़ देखने के लिए होती हैं, पाने के लिए नहीं।”


आरव को उसकी यही बात सबसे ज़्यादा पसंद थी।


कुछ महीनों में दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए। लखनऊ की गलियाँ अब उन्हें पहचानने लगी थीं। शामें छोटी लगने लगी थीं। बातें खत्म नहीं होती थीं। आरव को लगने लगा था कि शायद यही प्यार है। लेकिन उसने कभी कहा नहीं। वह सही समय का इंतज़ार करता रहा।


एक शाम दोनों गोमती नदी के किनारे बैठे थे। हवा हल्की थी और सूरज ढल रहा था। मीरा अचानक बोली—


“तुम्हें पता है, कुछ रिश्ते बहुत खूबसूरत होते हैं, लेकिन उन्हें नाम नहीं देना चाहिए।”


आरव ने मुस्कुराकर पूछा, “और अगर कोई नाम देना चाहे तो?”


मीरा कुछ देर चुप रही।


फिर बोली, “तो शायद वो रिश्ता बदल जाता है।”


उस दिन आरव समझ नहीं पाया कि मीरा क्या कहना चाहती थी।


समय बीतता गया। लेकिन एक दिन सब बदल गया।


मीरा ने मिलने के लिए बुलाया। उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी। वह चुप थी। दोनों उसी कैफे में बैठे जहाँ पहली बार ठीक से बात हुई थी।


मीरा ने धीरे से कहा—


“मुझे जाना होगा।”


आरव ने पूछा, “कहाँ?”


“दिल्ली… शायद हमेशा के लिए।”


आरव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।


“और हम?”


मीरा मुस्कुराई। वही मुस्कान जो हमेशा उसकी पहचान थी।


“हम अच्छे थे… लेकिन हर अच्छी कहानी पूरी नहीं होती।”


आरव पहली बार कुछ बोल नहीं पाया।


मीरा ने बताया कि उसके परिवार ने उसकी शादी तय कर दी है। उसने कोशिश की थी समझाने की, लेकिन हर बार वह अपने परिवार और अपने फैसलों के बीच उलझती चली गई।


आरव ने उससे सिर्फ़ एक सवाल पूछा—


“अगर मैं पहले कह देता… तो क्या कुछ बदल जाता?”


मीरा ने उसकी तरफ देखा।


आँखें हल्की भर आई थीं।


उसने कहा—


“शायद… और शायद नहीं। लेकिन अब ये सवाल हमारे किसी काम का नहीं।”


उस दिन दोनों बहुत देर तक साथ बैठे रहे। कोई वादा नहीं किया। कोई शिकायत नहीं की। बस चुप रहे।


अगले हफ्ते मीरा चली गई।


उसके बाद लखनऊ वही रहा, लेकिन आरव के लिए सब बदल गया।


अब भी वह कभी-कभी उसी किताबों की दुकान में जाता। वही कैफे, वही नदी किनारा। उसे उम्मीद नहीं थी कि मीरा लौटेगी। लेकिन कुछ जगहें छोड़ना आसान नहीं होता।


महीने सालों में बदल गए।


एक दिन बारिश हो रही थी। आरव एक पुराने बाज़ार से गुजर रहा था। तभी उसे सामने एक लड़की दिखाई दी। कुछ पल के लिए उसे लगा— मीरा।


लेकिन वह मीरा नहीं थी।


आरव मुस्कुराया।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह अब इंतज़ार नहीं कर रहा।


उसने समझ लिया था कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में रहने के लिए नहीं आते। वे हमें बदलने आते हैं।


उस रात उसने घर जाकर एक पुरानी डायरी निकाली। उसमें एक खाली पन्ना था।


उसने लिखा—


“प्रिय मीरा,


तुम्हें कभी बताया नहीं, लेकिन तुम मेरी सबसे खूबसूरत अधूरी कहानी हो। तुम्हारे जाने के बाद मैंने सीखा कि प्यार हमेशा साथ रहने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्यार किसी को जाने देने का नाम भी होता है।


मैं अब ठीक हूँ।


और उम्मीद करता हूँ कि तुम भी खुश हो।


– आरव”


उसने डायरी बंद की और खिड़की से बाहर देखा।


लखनऊ की रात पहले जैसी ही थी।


हवा चल रही थी।


शहर में रोशनी थी।


और कहीं भीतर, उसकी अधूरी मोहब्बत अब दर्द नहीं, एक मीठी याद बन चुकी थी।


क्योंकि हर प्रेम कहानी का अंत मिलन नहीं होता।


कुछ कहानियाँ बस दिल में रह जाती हैं…


हमेशा के लिए।

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